निजीकरण के बजाय वर्तमान व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण ज्यादा कारगर हो सकता है।जनसंख्या के बड़े समूह के लिए सरकारी स्वास्थ्य एक मात्र विकल्प बचता है जिसमें कई खामियां विद्यमान हैं।इसके विपरीत पिछले कुछ वर्षों में तमाम सुख-सुविधाओं से लैस हजारों की संख्या में बड़े आधुनिक अस्पताल खोले गए हैं, लेकिन महंगे इलाज के कारण इन अस्पतालों से भारतीय जनसंख्या के बड़े हिस्से को किसी प्रकार का लाभ नहीं मिल पाया है।इसको ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अधिक बजट का प्रावधान, अनियमितता की निगरानी, आधारभूत संरचना का विकास और जेनरिक दवाइयों को बढ़ावा आदि बीमार पड़ी चिकित्सा व्यवस्था को पुन: दुरुस्त कर सकते हैं। – डॉ.अजिता शर्मा, उदयपुर
अस्पतालों में संसाधनों के दुरुपयोग और कुप्रबंधन को रोकने के लिए एक निगरानी समिति होनी चाहिए। यह समिति नियमित निरीक्षण और ऑडिट के माध्यम से चिकित्सा उपकरण, दवाओं और वित्तीय संसाधनों की पारदर्शी और न्यायसंगत वितरण को सुनिश्चित कर सकती है। इससे रोगियों को आवश्यक सुविधाएँ समय पर उपलब्ध होंगी, आपात स्थितियों में संसाधनों का सही प्रबंधन होगा और भ्रष्टाचार या लापरवाही को रोका जा सकेगा। इस समिति में चिकित्सा विशेषज्ञ, वित्तीय ऑडिटर्स और स्वतंत्र पर्यवेक्षक शामिल होने चाहिए, जो समय-समय पर निरीक्षण करें और अनियमितताओं पर उचित कार्रवाई करें। साथ ही, एक सार्वजनिक शिकायत प्रणाली भी होनी चाहिए ताकि लोग कुप्रबंधन की रिपोर्ट कर सकें। यदि यह समिति प्रभावी रूप से कार्य करे, तो अस्पतालों की कार्यक्षमता और रोगियों की देखभाल में उल्लेखनीय सुधार संभव है। – शिवानी ठाकुर, इंदौर
देश में चिकित्सा सुविधा की सुधार की दिशा में सर्वप्रथम मेडिकल की पढ़ाई सस्ती करना आवश्यक है, साथ ही गरीब से गरीब को भी अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें इसलिए चिकित्सा को सरकार की तरफ से मुफ्त किया जाना आज की जरूरत है। – संजय डागा हातोद इन्दौर