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छतरपुर

प्राचीन मंदिरों के आंगन में बिखरा कलाओं का आनंद, भारतीय संस्कृति और भक्ति परम्परा के हुए दर्शन

51वें खजुराहो नृत्य समारोह का छठा दिन नृत्य और कला की उत्कृष्टता का प्रतीक बनकर सामने आया। इस दिन की प्रस्तुतियों ने भारतीय संस्कृति, भक्ति परंपरा और नृत्य की विविधता को बखूबी प्रस्तुत किया।

छतरपुरFeb 26, 2025 / 11:02 am

Dharmendra Singh

khajuraho festival

51वें खजुराहो नृत्य समारोह

छतरपुर. हमारी संस्कृति में नृत्य केवल एक नयनाभिराम प्रस्तुति नहीं, बल्कि यह कलाकार के गहन चिंतन को साकार करने वाला एक सार्थक प्रयास है। भारत में कला का स्वरूप परंपरानिष्ठ संस्कार के समान है, जो कठोर साधना से पल्लवित होकर, कलाकार के स्व की अभिव्यक्ति के साथ समकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य का भी वर्णन करता है। इस परंपरा को जीवित रखते हुए, खजुराहो के प्राचीन मंदिरों के आंगन में इन दिनों कलाओं का अद्भुत आनंद बिखरा हुआ है। 51वें खजुराहो नृत्य समारोह का छठा दिन नृत्य और कला की उत्कृष्टता का प्रतीक बनकर सामने आया। इस दिन की प्रस्तुतियों ने भारतीय संस्कृति, भक्ति परंपरा और नृत्य की विविधता को बखूबी प्रस्तुत किया।

पहली प्रस्तुति भरतनाट्यम नृत्य के माध्यम से हुई



इस दिन की पहली प्रस्तुति भरतनाट्यम नृत्य के माध्यम से हुई, जिसे मध्यप्रदेश की कामना नायक और उनके साथियों ने प्रस्तुत किया। इस नृत्य का विषय ‘दशावतार’ था, जो जयदेव की प्रसिद्ध काव्य रचना ‘गीत गोविंद’ पर आधारित था। दशावतार में भगवान श्री कृष्ण के अवतारों की कथा का सुंदर चित्रण किया गया। नृत्य की प्रस्तुतियां वीर रस, भक्ति रस, करुण रस और रौद्र रस से भरपूर थीं। कामना नायक और उनके साथी कलाकारों ने दर्शकों को अवतारों की कहानियां और उनके अद्भुत कार्यों का अनुभव कराया। इसके बाद, उन्होंने राग गंभीर नटई और ताल खंड त्रिपुट में मल्लारी की प्रस्तुति दी, जो दर्शकों के मन को मंत्रमुग्ध कर गया।

दूसरी प्रस्तुति सत्रिया नृत्य की



दूसरी प्रस्तुति सत्रिया नृत्य की थी, जिसे असम के कलाकार जतिन दास और उनके साथियों ने प्रस्तुत किया। असम की सांस्कृतिक विरासत और भक्ति परंपरा का यह एक अभिन्न अंग है, जिसमें सौंदर्य और लय का अद्भुत संगम दिखता है। ‘सूत्रधारी नृत्य’ से लेकर ‘झूमुरा नृत्य’ और ‘गूपी नृत्य’ तक की प्रस्तुतियों ने सत्रीया नृत्य की समृद्ध परंपरा का समर्पण किया। भगवान श्री कृष्ण की वंदना और विभिन्न नृत्य मुद्राओं के माध्यम से नाट्यशास्त्र के अष्ट रसों की भी प्रस्तुतियां की गईं। यह प्रस्तुति दर्शकों को भारतीय नृत्य की समृद्ध और विविध परंपरा से परिचित कराती है।

अंतिम प्रस्तुति मणिपुरी नृत्य की



छठे दिन की अंतिम प्रस्तुति मणिपुरी नृत्य की थी, जिसे मणिपुरी नर्तनालय ने प्रस्तुत किया। यह प्रस्तुति पद्मश्री गुरु कलावती देवी और बिम्बावती देवी के निर्देशन में दी गई। मणिपुर की रथयात्रा से जुड़े पारंपरिक तत्वों और भक्तिगीतों के माध्यम से नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिसमें भगवान कृष्ण की वंदना के साथ-साथ शिव वंदना और कृष्ण के विभिन्न रूपों की झलक भी दिखाई गई। ‘पूर्ण पुरुषोत्तम’ नृत्य में भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार का चित्रण किया गया, जो अधर्म का अंत कर धर्म की स्थापना करते हैं।



बाल नृत्य महोत्सव में छठे दिन की प्रस्तुतियां



खजुराहो के बाल नृत्य महोत्सव में छठे दिन भी बाल कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। कम उम्र में नृत्य के प्रति गहरी आस्था और समर्पण इन बच्चों के भविष्य के सुनहरे संकेत दे रहे थे। पहले प्रदर्शन में अनुकृति मिरदवाल ने कथक नृत्य की एक सुंदर प्रस्तुति दी। अनुकृति ने 8 वर्ष की आयु से अपनी कथक नृत्य यात्रा शुरू की थी, और इस बार उन्होंने “रास ताल” और “शिव ध्रुपद” प्रस्तुत किए। उनके साथ संगत करने वाले कलाकारों ने भी प्रस्तुति में सामंजस्य और तालमेल का बेहतरीन उदाहरण पेश किया। इसके बाद, प्रगति झा ने भी कथक नृत्य से दर्शकों को नृत्य के सौंदर्य की अनुभूति कराई। उनके प्रदर्शन में पारंपरिक पढ़ंत, विलंबित और मध्य लय की बंदिशें और एक भावपूर्ण ठुमरी शामिल थी। उनकी प्रस्तुति ने उनकी तकनीकी दक्षता, लयकारी, भाव-भंगिमा और गहरी अभिव्यक्ति को दर्शाया।


खजुराहो मंदिरों का ऐतिहासिक महत्व और संस्कृति पर चर्चा



इस दिन “कलावार्ता” सत्र में पुरातत्वविद शिवकांत वाजपेयी ने खजुराहो मंदिरों और उनके ऐतिहासिक महत्व पर एक व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 925 ईस्वी से लेकर 1200 ईस्वी तक हुआ था। यह मंदिर चंदेल शासकों द्वारा बनवाए गए थे, जिनमें राजा विद्याधर प्रमुख थे। वाडपेयी ने यह भी बताया कि भारतीय मंदिरों का अस्तित्व चौथी शताब्दी से पहले था, जिसका प्रमाण विदिशा में मिले अवशेषों से मिलता है। इस सत्र ने खजुराहो के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को न केवल जीवित किया, बल्कि उसे समझने का एक नया दृष्टिकोण भी प्रदान किया। इसके बाद, वरिष्ठ कथक नृत्यांगना सुश्री रजनी राव ने भारतीय नृत्य और मंदिरों के बीच संबंध पर व्याख्यान दिया। उनका कहना था कि भारतीय नृत्य मंदिरों की परंपरा से जुड़ा हुआ है और यह कला न केवल धार्मिक अभिव्यक्ति का माध्यम है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की गहरी समझ और आत्मा को भी दर्शाती है। वरिष्ठ नृत्यांगना और पद्मविभूषण डॉ. पद्मा सुब्रह्मण्यम ने भारतीय नृत्य के भविष्य और उसके योगदान पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि हम भारत के सांस्कृतिक योद्धा हैं और हमारे कंधों पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। भारतीय कलाओं को प्रोत्साहित करने और बढ़ावा देने का कार्य केवल वरिष्ठ कलाकारों का नहीं, बल्कि युवा कलाकारों की भी जिम्मेदारी है। उनके शिष्य और भारतीय नृत्य के वरिष्ठ कलाकार पियाल भट्टाचार्य और डॉ. राजश्री वासुदेवन ने भी उनके योगदान और कार्यों पर चर्चा की।

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