scriptदस पुत्रों के बराबर होता है एक वृक्ष | One tree is equal to ten sons | Patrika News
ओपिनियन

दस पुत्रों के बराबर होता है एक वृक्ष

सुनील कुमार महला

जयपुरApr 03, 2025 / 04:43 pm

Neeru Yadav

वन क्षेत्र संकट में हैं। इन पर अतिक्रमण हो रहा है, यह केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13,056 वर्ग किमी वन क्षेत्र पर अतिक्रमण हुआ है, जो दिल्ली के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक है, यह चिंताजनक है। मध्य प्रदेश में सबसे अधिक 5,460.9 वर्ग किमी वन भूमि पर कब्जा है, जबकि 409 वर्ग किमी भूमि अतिक्रमण मुक्त की जा चुकी है। कहना ग़लत नहीं होगा कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण को सौंपी गई रिपोर्ट कहीं न कहीं देश में वनों के अतिक्रमण की भयावह स्थिति को उजागर करती है। ऐसे में, सरकारों का इस मुद्दे पर गंभीर होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि हम भी पर्यावरण के प्रति जागरूक बनें। 13,056 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र पर चिंताजनक इसलिए भी है क्यों कि आज हम लगातार ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या से जूझ रहे हैं। जानकारी के अनुसार यह इतना बड़ा क्षेत्र है कि इतने में नौ दिल्ली (कुल क्षेत्रफल 1,484 वर्ग किमी.) बसाई जा सकती हैं। यह जमीन दिल्ली, सिक्किम और गोवा के कुल भौगोलिक क्षेत्र से भी अधिक है। रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2024 तक 25 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कुल 13,05,668.1 वन क्षेत्र पर अतिक्रमण था। अभी 10 राज्यों ने आंकड़े प्रस्तुत नहीं किए हैं। एनजीटी ने पिछले साल एक मीडिया रिपोर्ट पर स्वत: संज्ञान लिया था, जिसमें सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए यह बताया गया था कि देश में 7,50,648 हेक्टेयर (या 7506.48 वर्ग किमी.) वन क्षेत्र अतिक्रमण के अधीन है, जो दिल्ली के आकार की तुलना में पांच गुना अधिक है। हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि वन हैं तो हम हैं। कहना ग़लत नहीं होगा वन जहां प्रदूषण को नियंत्रित करने में अहम् भूमिका का निर्वहन करते हैं, वहीं दूसरी ओर वन वैश्विक जल चक्र में अहम भूमिका निभाते हैं, ये वर्षा तथा सूखे को नियंत्रित करते हैं। वनों से भोजन, दवाइयां, विभिन्न उत्पाद, लकड़ी, गोंद तो प्राप्त होते ही हैं, वहीं साथ ही साथ ये कई जीवों के लिए प्राकृतिक आवास हैं तथा वनों से हमें रोज़गार भी मिलता है। ये मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, मिट्टी को समृद्ध और संरक्षित करते हैं। इतना ही नहीं, वन समुदायों को भूस्खलन और बाढ़ से भी बचाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वन हमारे पारिस्थितिकीय तंत्र का मुख्य आधार हैं, जो जैव-विविधता को तो संरक्षित रखते ही हैं, जलवायु में आ रहे बदलावों से निपटने और कार्बन उत्सर्जन को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, जल चक्र को संतुलित रखते हैं और अनगिनत प्रजातियों को आश्रय भी देते हैं। बहरहाल, हाल ही में आई रिपोर्ट में जिन राज्यों के आंकड़ों के बारे में जानकारी दी गई है, उनमें अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, असम, अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव, केरल, लक्षद्वीप, महाराष्ट्र, ओडिशा, पुडुचेरी, पंजाब, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड, सिक्किम, मध्यप्रदेश, मिजोरम और मणिपुर शामिल हैं तथा जिन राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों ने अभी भी वन अतिक्रमण का विवरण प्रस्तुत नहीं किया है, उनमें बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, नगालैंड, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि वन क्षेत्र या रिकॉर्डेड फॉरेस्ट एरिया (आरएफए) में सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर वन के रूप में नामित भूमि शामिल होती है, भले ही उस पर पेड़ न हों। गौरतलब है कि आरएफए को क्रमशः तीन श्रेणियों आरक्षित वन(जिन्हें पूर्ण संरक्षण प्राप्त है और जहां शिकार और चराई जैसी गतिविधियों पर आमतौर पर प्रतिबंध है) संरक्षित वन(जहां कुछ गतिविधियों की अनुमति है, जब तक कि उन्हें विशेष रूप से प्रतिबंधित न किया गया हो) तथा अवर्गीकृत वन(जिन्हें आरक्षित या संरक्षित के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है) को शामिल किया गया है। मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2024 तक मध्यप्रदेश में सबसे अधिक 5,460.9 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र पर अतिक्रमण था। इसमें कहा गया है कि असम में 3,620.9 वर्ग किलोमीटर, कर्नाटक में 863.08 वर्ग किलोमीटर, महाराष्ट्र में 575.54 वर्ग किलोमीटर, अरुणाचल प्रदेश में 534.9 वर्ग किलोमीटर, ओडिशा में 405.07 वर्ग किलोमीटर, उत्तर प्रदेश में 264.97 वर्ग किलोमीटर, मिजोरम में 247.72 वर्ग किलोमीटर, झारखंड में 200.40 वर्ग किलोमीटर और छत्तीसगढ़ में 168.91 वर्ग किलोमीटर वन भूमि पर अतिक्रमण है। कहना चाहूंगा कि आज देश में वनों की अवैध और अंधाधुंध कटाई के कारण पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा है। पिछले कुछ सालों से देश के कृषि क्षेत्र में भी अभूतपूर्व विस्तार हुआ है, इससे भी वन क्षेत्रों में कहीं न कहीं कमी आई है। शहरीकरण और औधोगिकीकरण से भी वन क्षेत्रों पर कहीं न कहीं प्रभाव पड़ा ही है। आज देश में खनन कार्य हो रहें हैं, बांध व सड़कें बनाई जा रही हैं। कहना चाहूंगा कि खनन और बुनियादी ढांचे के विकास के नाम पर जिस तेजी से वनों का दोहन बढ़ रहा है, वह वाकई चिंता का विषय है।सच तो यह है कि आज हम पर्यावरण संरक्षण पर उस अनुरूप ध्यान नहीं दे पा रहे हैं,जिस अनुरूप उस पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।सच तो यह है कि पर्यावरण पर ध्यान देने के लिए, हमें अपने व्यवहार में बदलाव लाने होंगे। इसके लिए, हमें पर्यावरण के बारे में जागरूक होना होगा और पर्यावरण संरक्षण के लिए अपने यथेष्ठ व नायाब कदम उठाने होंगे और यह तभी संभव हो सकता है जब हम पर्यावरण संरक्षण के प्रति कृतसंकल्पित हों। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज हम पर्यावरण संरक्षण को लेकर कहीं न कहीं लापरवाही बरत रहे हैं, जबकि हमें अपनी धरती के पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति हमेशा सजग व जागरूक होना चाहिए। अन्यथा आने वाली पीढ़ियां हमें कोसेगी। संस्कृत में पेड़ों/वनों का महत्व बताते हुए खूबसूरत शब्दों में क्या खूब कहा गया है कि -‘इह पुष्पिताः फलवन्तः च मानवान् तर्पयन्ति, वृक्षाः वृक्षदं पुत्रवत् परत्र च तारयन्ति।’ इसका मतलब यह है कि फल और फूल देने वाले पेड़ मनुष्यों को तृप्त करते हैं, लेकिन आज हम वनों का अतिक्रमण कर रहे हैं,यह ठीक नहीं है। हाल फिलहाल,चिंता इस बात को लेकर भी है कि बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान समेत करीब दस राज्यों ने तो अभी वन अतिक्रमण क्षेत्र की जानकारी तक नहीं उपलब्ध कराई है। जाहिर है कि इन राज्यों में वनों के अतिक्रमण के आंकड़े जुड़ने के बाद तो देश में वनों की स्थिति और भी अधिक भयावह हो सकती है।मंत्रालय की रिपोर्ट यह तो बताती है कि 409 वर्ग किलोमीटर वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया जा चुका है(जैसा कि ऊपर भी इस लेख में यह जानकारी दे चुका हूं), लेकिन यह स्पष्ट नहीं करती कि क्या यह क्षेत्र मार्च, 2024 तक हुए अतिक्रमण में शामिल है या नहीं ? बहरहाल, यहां सवाल यह उठता है कि इतने बड़े क्षेत्र पर आखिर अतिक्रमण कैसे संभव हुआ ? इस अतिक्रमण के लिए जिम्मेदार कौन हैं ? सवाल यह भी है कि क्या यह कोई नीतिगत खामियों का हिस्सा है अथवा स्थानीय प्रशासन की लापरवाही अथवा नाकामी ? भारत की राष्ट्रीय वन नीति के मुताबिक, देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 33% हिस्सा वन होना चाहिए। यह वन और वृक्षों से आच्छादित होना चाहिए। वास्तव में, इस नीति का मकसद पर्यावरणीय स्थिरता बनाए रखना और देश की प्राकृतिक विरासत को बचाना है, लेकिन आज वनों पर अतिक्रमण होने से वन क्षेत्र कम हो रहें हैं, यह संवेदनशील है। कहना ग़लत नहीं होगा कि वनों में कमी से जलवायु संबंधी अनेक जोखिम पैदा होते हैं। जलवायु जोखिम सूचकांक-2025 बताता है कि भारत सर्वाधिक प्रभावित देशों में छठे स्थान (1993-2022) पर है, जहाँ चरम मौसमी घटनाओं के कारण 80,000 मौतें (विश्व की 10%) हुई हैं तथा कुल वैश्विक आर्थिक नुकसान (180 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का 4.3% नुकसान हुआ है।सच तो यह है कि आज वनों की कटाई, वन क्षेत्र के अतिक्रमण, चरागाहों में लगातार कमी और अनियंत्रित औधोगिकीकरण और शहरीकरण ने मौसम चक्र को असंतुलित किया है, जिससे मौसम संबंधी असामान्य घटनाएं भारत समेत पूरी दुनिया में बढ़ी हैं।भारत तो पहले ही जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है। पिछले दो सालों से तापमान में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। वनों के अंधाधुंध दोहन,अतिक्रमण से और अधिक जलवायु परिवर्तन होंगे। वनों के अतिक्रमण से जलवायु असंतुलन, बाढ़,भू-स्खलन और सूखे जैसी आपदाएं बढ़ सकती हैं। यदि वन नहीं होंगे तो बारिश नहीं होगी। कार्बन अवशोषण की क्षमता कम होने से वायु प्रदूषण और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि होगी। ऐसे में, आज जरूरत इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर एक व्यापक रणनीति बनाएं। आज आधुनिक तकनीक और सूचना क्रांति का जमाना है।वन क्षेत्रों की सतत् व माकूल निगरानी के लिए सैटेलाइट इमेजरी और ड्रोन इत्यादि का उपयोग बढ़ाया जा सकता है और वनों का संरक्षण किया जा सकता है। वनों के संरक्षण के लिए वनों की कटाई को नियंत्रित किया जाना चाहिए। वनों को अतिक्रमण से बचाया जाना चाहिए।वनों की आग(दावानल) से बचाव किए जाने की जरूरत है। अधिकाधिक वनरोपण करने की आवश्यकता है। जो भी पौधारोपण किया जाए,उनकी सतत् निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए, क्यों कि वनों को भी छोटे बच्चों की तरह पालना पड़ता है तभी जाकर वन क्षेत्र विकसित होते हैं। आज पौधारोपण अभियान तो चलते हैं लेकिन जो पेड़-पौधे लगाए जाते हैं,उनकी सतत् निगरानी नहीं हो पाती, इसलिए पेड़ समय से पहले ही मर जाते हैं। आज जरूरत इस बात की भी है कि हम वनों को रोगों से बचाएं।वनों के महत्व के बारे में अधिकाधिक लोगों को जागरूक करें। सामाजिक वानिकी को बढ़ावा दें। वन संरक्षण से जुड़े नियमों और कानूनों का पालन करें।बाँध और बहुउद्देशीय योजनाओं, विकास योजनाओं आदि को बनाते समय वन संरक्षण का ध्यान रखें। स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण में शामिल करें। अगर हम वनों के संरक्षण के प्रति समय रहते नहीं चेते तो यह मानवजाति ही नहीं अपितु समस्त धरती के प्राणियों के बहुत ही विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। हमें यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि वन हमारी राष्ट्रीय धरोहर हैं और इन्हें बचाना हम सबकी सामूहिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है। मत्स्यपुराण में कहा गया है कि दस कुओं के बराबर एक बावड़ी होती है, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र है और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है।

Hindi News / Opinion / दस पुत्रों के बराबर होता है एक वृक्ष

ट्रेंडिंग वीडियो