दावानल की रोकथाम यों भी काफी मुश्किल भरा काम होता है। लेकिन भविष्य के खतरों को कम करने की दिशा में जंंगलात महकमे की तैयारियों की तह में जाएं तो सारी कवायद कागजों में नजर आती है। पिछले कुछ सालों में जितनी बातें अधिकारियों ने दावानल को लेकर की, उससे काफी कम काम जमीनी स्तर पर हुआ है। मेवाड़ के समृद्ध जंगलों में अभी तक फायर लाइन का काम भी पूरा नहीं हो सका है। जहां फायर लाइन हैं, वे भी काम नहीं कर रही हैं। सेटेलाइट इमेज से आग की लोकेशन मिलने का दावा करने वाले वन विभाग के पास संसाधन के नाम पत्ते और झाडिय़ां ही हैं। विभाग के कर्मचारी इन्हीं के सहारे मगरियों पर आग बुझाते दिख जाते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में रास्ता नहीं होने से दमकलकर्मी भी वहां नहीं पहुंच पाते। नतीजतन जबतक आग पर काबू पाया जाता है, तबतक काफी नुकसान हो जाता है। ऐसे में जरूरी है कि वन विभाग कागजी दावों से बाहर निकल दावानल पर नियंत्रण के लिए प्रभावी इंतजाम करे। जिन क्षेत्रों में फायर लाइन नहीं बिछी है, वहां इस पर शीघ्र कार्य होना चाहिए। सरकार को भी चाहिए कि पिछले वर्षों में जंगल की आग को नियंत्रित करने के लिए हुई कवायद के विषय में वन विभाग से जानकारी ले। साथ ही इस पर गंभीरता दिखाते हुए प्रभावी कदम उठाए। जंगल में आए दिन लगने वाली आग की घटनाएं मेवाड़ में ही होती हों ऐसा नहीं है। जहां भी आग बुझाने के उपाय नाकाफी हों, वहां ऐसे ही हालात सामने आते हैं। जंगलों को आग की घटनाओं से महफूज रखना होगा।
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