बरसाती जल का हो सही उपयोग
मरुस्थलीय क्षेत्र में बरसात सीमित होती है और जल का संचयन न होने के कारण भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। पारंपरिक जल स्रोत जैसे खड़ीन, तालाब, कुएं और बावडिय़ां कभी जल संरक्षण के लिए प्रभावी थे, लेकिन आधुनिक समय में इनकी अनदेखी हो रही है। यदि वर्षाजल को रोककर कृषि, पशुपालन और पेयजल के लिए इस्तेमाल किया जाए तो यह जैसलमेर की जल समस्या का हल हो सकेगा।
खड़ीन प्रणाली: जल संरक्षण का परंपरागत मॉडल
पालीवाल ब्राह्मणों की ओर से विकसित खड़ीन प्रणाली जल संरक्षण का सबसे प्रभावी तरीका था, जिसमें बारिश के पानी को बड़े खेतों में रोका जाता था और धीरे-धीरे मिट्टी में रिसकर यह पानी लंबे समय तक कुओं और तालाबों में उपलब्ध रहता था। किसान और आमजन को जैसलमेर जिले के 84 गांवों में स्थित खड़ीनों का अध्ययन करने की दरकार है, ताकि पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों को पुनर्जीवित किया जा सके।
एक्सपर्ट व्यू: छोटे बांध, एनीकट और जलाशयों का हो निर्माण
इतिहासवेत्ता ऋषिदत्त पालीवाल का कहना है कि काकनय, काहला और गोगड़ी नदियों के पानी को रोकने के लिए छोटे बांध, एनीकट और जलाशयों का निर्माण किया जाए, ताकि यह पानी वाष्पीकरण से पहले उपयोग में लाया जा सके। इसके साथ ही शहरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य किया जाए और प्रत्येक घर, सरकारी भवन एवं व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में इस तकनीक को अपनाया जाए। जैसलमेर के चारों तरफ सैकड़ों की संख्या में विशाल तालाब जो मिट्टी से अटे पडे उनको खुदवाकर बारिश के जल को लम्बे समय तक के लिए संरक्षित किया जा सकता है, ताकि आसपास रहने वाले लोागे को पीने का पानी सुलभ हो सके। प्रशासन को चाहिए कि मनरेगा के तहत तालाबों की खुदाई को सुनिश्चित किया जाए। यूं हो सकेगा जल संरक्षण
- बरसाती पानी के भंडारण को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं लागू हों।
-शहरों में नालों के जरिए बहने वाले पानी को रोककर पुन: उपयोग लायक बनाया जाए।
- ग्रामीण क्षेत्रों में परंपरागत जल स्रोतों का पुनरुद्धार किया जाए।
- नदियों के जल को कृत्रिम झीलों व जलाशयों में संरक्षित किया जाए।