पिछले महीने विधानसभा ने ‘कर्नाटक सार्वजनिक खरीद में पारदर्शिता (संशोधन) विधेयक, 2025’ पारित किया था, जिसमें 2 करोड़ रुपये तक के (सिविल) कार्यों और 1 करोड़ रुपये तक के माल/सेवा खरीद अनुबंधों में मुसलमानों के लिए 4 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। अब विधेयक को अधिनियम बनने के लिए राज्यपाल की मंजूरी की आवश्यकता है। विहिप ने विधेयक की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि आरक्षण पूरी तरह से धर्म पर आधारित है, जो अस्वीकार्य है।
विहिप ने कहा, संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव निषिद्ध है। हालांकि, कर्नाटक सरकार ने तुष्टीकरण की राजनीति और वोट बैंक के विचारों से प्रेरित होकर इस विधेयक को असंवैधानिक रूप से मंजूरी दी है।
पूर्व में साल 2005 में, जब आंध्र प्रदेश सरकार ने 5 प्रतिशत आरक्षण (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों और सार्वजनिक सेवाओं में नियुक्तियों या पदों के लिए) प्रदान करने वाले इसी तरह के विधेयक को मंजूरी दी थी, तो आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया था कि ऐसा आरक्षण असंवैधानिक है।