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टैरिफ वॉर : प्रभावित देश एकजुट हुए तो अमरीका को नुकसान संभव

— सुखवीर सिंह (लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं)

जयपुरApr 04, 2025 / 01:34 pm

विकास माथुर

अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने व्यापारिक भागीदारों पर व्यापक रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है। उन्होंने 170 से अधिक देशों के लिए नई टैरिफ दरों की घोषणा की है। ट्रंप ने भारत पर 27 प्रतिशत पारस्परिक टैरिफ लगाया है। इसी प्रकार चीन (34%), वियतनाम (46%), दक्षिण कोरिया (25%), यूरोपीय संघ (20%) और अन्य देशों को भी उच्च टैरिफ की व्यापार बाधाओं का सामना करना पड़ेगा। वित्तीय वर्ष 2025-26 के बजट में भारत सरकार ने टैरिफ वॉर को भांपते हुए कई वस्तुओं पर सीमा शुल्क में कटौती की थी। बजट के दौरान 6 फीसदी डिजिटल सर्विस टैक्स, जो ‘गूगल टैक्स’ के रूप में भी जाना जाता है, को भी वापस लिया था। इन सब प्रयासों के बावजूद अनिश्चितता के बादल बने हुए हैं। जनवरी के महीने से शेयर बाजार भी टैरिफ वॉर की चपेट में आ गया है।
राष्ट्रपति ट्रंप के अप्रत्याशित निर्णय लेने की आदत के कारण अविश्वास और अस्थिरता की स्थिति बनी हुई है। आयात एवं निर्यात कर लगाने के कई कारण होते हैं। इनमें घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना प्रमुख कारण है। उदाहरण के तौर पर, भारत कई बार केमिकल, स्टील, सोलर पैनल आदि की डंपिंग को रोकने के लिए भारी आयात शुल्क लगाता है। कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण की रक्षा और हानिकारक वस्तुओं को रोकने के लिए भी अधिक शुल्क लगाया जाता है। देशों की आर्थिक स्थिति, प्रोडक्ट उत्पादन और टेक्नोलॉजी का स्तर अलग-अलग होने से आयात शुल्क में अंतर लाजमी है। अमरीका के द्वारा आयात शुल्क बढ़ाए जाने पर भारत के निर्यात पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा, इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रभाव निर्यात के 10-12 फीसदी तक हो सकता है, जो लगभग 8-10 बिलियन डॉलर होगा। इस व्यापार व्यवधान के कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर जो प्रभाव होगा, वह जीडीपी का 0.1 फीसदी से भी कम होगा। यह प्रभाव भी कुछ समय तक ही रहनेे की संभावना है। हालांकि, भारत ने इस प्रभाव को कम करने के लिए ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपियन यूनियन, मिडिल ईस्ट आदि देशों के साथ सक्रियता से व्यापार समझौते पर रणनीतिक रूप से काम करना शुरू कर दिया है।
अमरीका ने कई देशों पर उच्च टैरिफ लगाया है। कई देशों पर यह भारत से भी अधिक है, जिससे भारत को तुलनात्मक तौर पर हानि होने की संभावना खत्म सी हो जाती है, बल्कि अनुकूल प्रतिस्पर्धा से फायदा भी हो सकता है। भारत के लिए टैरिफ वॉर की परिस्थितियां आपदा में अवसर के समान भी हो सकती हैं और वह परस्पर सहयोग से ट्रेड में अपनी भागीदारी बढ़ा सकता है। 2023 में, वैश्विक माल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 1.8 फीसदी थी, इसे बढ़ाने का यह एक मौका है। दूसरी ओर, टैरिफ वॉर से अमरीका और वैश्विक अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लग सकता है।
अमरीकी फेडरल रिजर्व के पूर्वानुमानों के अनुसार, इस वर्ष अमरीकी अर्थव्यवस्था की सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 1.7 फीसदी रहेगी, जो फेड के दिसंबर के अनुमान 2.3 फीसदी से काफी कम है। आयात शुल्क लगने से अमरीका में आने वाला सामान महंगा हो जाएगा। इस संबंध में फेड अध्यक्ष जेरोम पॉवेल का मानना है कि टैरिफ वॉर मुद्रास्फीति के दृष्टिकोण से अमरीका के लिए घातक होगा। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौद्रिक अथवा वित्तीय नीति व्यापार युद्ध के विपरीत प्रभावों की भरपाई नहीं कर सकती। जेपी मॉर्गन के अनुसार हाल ही की व्यापार नीतियों के कारण अमरीका में मंदी की संभावना 40 फीसदी तक बढ़ गई है। वरिष्ठ अर्थशास्त्री, प्रेस्टन कैल्डवेल ने तो यहां तक कह दिया कि टैरिफ के कारण आर्थिक मंदी के साथ-साथ मुद्रास्फीति और ढीले जॉब मार्केट के कारण अर्थव्यवस्था की विकास की दर अगले तीन सालों में 0.32 फीसदी तक जा सकती है।
अमरीका का यह मानना कि वह घरेलू खपत की आपूर्ति उत्पादन बढ़ाकर कर लेगा, व्यावहारिक नहीं लगती है। जानकारों का मानना है कि घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए कम से कम 3-5 वर्ष का समय चाहिए। यह बात उसे गहरे आर्थिक संकट में धकेल सकती है जो मुद्राजनित आर्थिक मंदी का कारण हो सकती है। कुल मिलाकर अमरीका का यह कदम उसकी अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती भी साबित हो सकता है। दूसरा यह कि यदि अमरीका भारत पर दबाव बनाने के उद्देश्य से 27 फीसदी उच्च टैरिफ लगाना जारी रखता है तो व्यापार क्षेत्र में तनाव के रिश्तों का प्रशांत महासागर में रणनीतिक साझेदारी पर गहरा असर पड़ सकता है, जो अमरीका के लिए चिंता का विषय होगा। अंत में यह भी कि सभी देश टैरिफ वॉर की चपेट में आने के कारण एक-दूसरे मिलकर काम करेंगे, जिससे अमरीका आर्थिक तौर पर अलग-थलग हो सकता है।

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