पहले लगाई गुहार, अब हुई मुलाकात
बांग्लादेश इस मुलाकात को लेकर बेहद उत्साहित था और उसने भारत से कई बार द्विपक्षीय बैठक की गुहार लगाई थी। पिछले साल दिसंबर में भी मोहम्मद यूनुस ने पीएम मोदी से मिलने की इच्छा जताई थी, लेकिन भारत की ओर से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। बैंकॉक में भी बांग्लादेश के अनुरोध के बावजूद भारत शुरू में तैयार नहीं था। आखिरी मौके पर भारत ने इस मुलाकात को हरी झंडी दिखाई, लेकिन यह साफ था कि यह मुलाकात औपचारिकता से ज्यादा कुछ नहीं थी। वीडियो फुटेज में पीएम मोदी भारतीय परंपरा के अनुसार हाथ जोड़कर अभिवादन करते दिखे, फिर मोहम्मद यूनुस से औपचारिक रूप से हाथ मिलाया। लेकिन उसमें वह जोश और गर्माहट गायब थी, जो पीएम मोदी की डोनाल्ड ट्रंप, बराक ओबामा, जो बाइडेन या व्लादिमीर पुतिन जैसे नेताओं के साथ मुलाकातों में देखने को मिलती है।
चीन में दिया था तनावपूर्ण बयान
इस मुलाकात की ठंडक के पीछे कई वजहें साफ नजर आती हैं। शेख हसीना के शासन के पतन के बाद बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में जिस तरह हिंदुओं पर हमले बढ़े, उसे भारत ने गंभीरता से लिया है। इसके साथ ही बांग्लादेश का पाकिस्तान और चीन की ओर बढ़ता झुकाव भी नई दिल्ली को खटक रहा है। हाल ही में बीजिंग दौरे के दौरान मोहम्मद यूनुस ने बंगाल की खाड़ी में खुद को “गार्जियन” बताते हुए भारत के खिलाफ तीखी टिप्पणी की थी। उन्होंने भारत के नॉर्थ-ईस्ट के करीब कारोबार के लिए चीन को आमंत्रित किया, जिसे भारत ने अपने हितों पर सीधा हमला माना। जयशंकर का पलटवार
इस बयान का जवाब भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बिम्सटेक बैठक में देते हुए कहा कि बंगाल की खाड़ी में सबसे बड़ी तटीय सीमा भारत की है। जयशंकर का यह पलटवार न सिर्फ मोहम्मद यूनुस के दावे को खारिज करता था, बल्कि बांग्लादेश के नए साझेदार के तौर पर चीन को पेश करने की कोशिश को भी करारा जवाब था।
इस मुलाकात को देखकर यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या पीएम मोदी ने मोहम्मद यूनुस से बेमन से हाथ मिलाया? जहां पीएम मोदी की विदेशी नेताओं के साथ मुलाकातें आमतौर पर निजी बातचीत और आत्मीयता के साथ शुरू होती हैं, वहीं इस बार ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार, “चिकन नेक” कॉरिडोर के आसपास तनाव और चीन के साथ बढ़ती नजदीकी ने भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर बर्फ की मोटी चादर बिछा दी है। बैंकॉक की यह मुलाकात भले ही औपचारिक रूप से हो गई, लेकिन दोनों देशों के बीच गहरे तनाव को कम करने में नाकाम रही। यह मुलाकात एक संकेत थी—भारत अपनी चिंताओं को नजरअंदाज करने के मूड में नहीं है, और बांग्लादेश को अपने कदमों पर फिर से विचार करना होगा।