आज के दौर में जब राजनीतिक और आर्थिक जगत में महिला सशक्तीकरण और लैंगिक समानता का दम भरा जाता है तब ऐसी बातें करना दर्शाता है कि पितृसत्तात्मक सोच में बदलाव लाना संभव नहीं है। इतिहास बताता है कि अंग्रेजों ने रंगभेद को आधार बनाकर भारतीयों पर प्रभुत्व स्थापित किया क्योंकि उनके लिए काला रंग हीनता, अज्ञानता, गुलामी का प्रतीक था और गोरा रंग श्रेष्ठता, उच्चता और स्वतंत्र सोच का। लेकिन स्वाधीनता के बाद भी हमारा समाज इस मानसिकता से बाहर नहीं आ पाया है। इसलिए यदा-कदा महिलाओं पर इस तरह के तंज कसकर पितृसत्तात्मक समाज अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करने का प्रयास करता नजर आता है। भले ही फिर महिला किसी भी पद पर आसीन हो, उसने सफलता के कितने ही झंडे गाड़े हों।
संभवत: गोरा होना, विशेष रूप से लड़की के सन्दर्भ में, सुन्दरता का पर्याय माना जाता है और सुन्दरता सफलता का पर्याय है। आज के मीडिया समाज में उपभोक्तावाद ने सुन्दरता को क्रय-विक्रय की वस्तु में परिवर्तित कर दिया है और मानव शरीर को कॅमोडिटी के रूप में प्रस्तुत किया है। महिला के शरीर को एक विक्रय उत्पाद के रूप में अनेक ब्यूटी प्रोडक्ट, वस्त्र व आभूषणों के विज्ञापन से जोड़ दिया गया। इसके कारण मानव शरीर का हर अंग उपभोक्ता वस्तु के रूप में स्थापित होकर सौन्दर्य के बाजार को गति देता दिखाई देता है। परिणामस्वरूप नस्लवाद एक नए रूप में उभर कर आया है। विभिन्न टीवी चैनलों पर प्रसारित विज्ञापनों व धारावाहिकों की चर्चा इस संदर्भ में की जा सकती है, जो इसके पक्ष में तर्क देते नजर आते हैं।
अभिनेत्री नंदिता दास ने एक साक्षात्कार के दौरान कहा कि फिल्मों में शिक्षित, उच्चवर्ग की महिला की भूमिका के लिए उनसे मेकअप के माध्यम से त्वचा को गोरा करने के लिए कहा जाता है, लेकिन जब उन्हें कोई ग्रामीण पृष्ठभूमि वाला रोल करना होता है तब इस बात के लिए उनके सांवले रंग को ख़ूबसूरत कहा जाता है यानी यह कहा जा सकता है कि महिलाओं को रंग, जाति, वर्ग, ग्रामीण-शहरी, आर्थिक स्थिति और लैंगिक इत्यादि अनेक आधारों पर मूल्यांकित किया जाता है केवल उसका योग्य होना ही पर्याप्त नहीं है। ऐसा लगता है कि ज्ञान, संस्कृति, अर्थतंत्र, पवित्रता, शक्ति सम्बन्ध, राजनीति और विचारधारा की रचना करने में महिला कहीं है ही नहीं। अगर कहीं है भी तो वह अधीनस्थ है। चूंकि वह केवल एक शरीर है, जिसके पास केवल भावनाएं हैं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य विशेष रूप से पुरूष की चेतना में यह डालना आवश्यक है कि महिला के पास केवल शरीर ही नहीं है अपितु वह ज्ञान, अर्थतंत्र, राजनीति, संस्कृति, विचारधारा और मूल्यों के निर्माण में भी प्रभावी सहभागिता करती है।
केवल उसके शरीर, रंग-रूप या उसकी कद-काठी को केन्द्र में रखकर समाज के विकास व निर्माण में उसके योगदान/सहभागिता को नजरअंदाज करना कहां तक उचित है? इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि विवाह के लिए सुडौल शरीर, गौर वर्ण, सुंदर, संस्कारी कन्या को प्राथमिकता दी जाती है और लड़के की डिग्री, आय और पेशे/व्यवसाय को। वस्तुत: रंगभेद की यह अवधारणा चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि यह लैंगिक भेदभाव को भी बढ़ावा देती है। दूसरी तरफ बाजार की शक्तियों ने इस तरह के भेदभावों को भी विज्ञापनों व धारावाहिकों के माध्यम से भुनाने की कोशिश की है और इसे लाभ के बाजार में बदल दिया है। बाजार की इन शक्तियों ने उपभोक्ता के सामने आकर्षण का बाजार उत्पन्न किया है। ब्यूटी प्रोडक्टस को सफलता के साथ जोड़कर युवाओं को आकर्षित किया जा रहा है। क्योंकि युवा हर हाल में सफलता पाना चाहता है इसलिए आकर्षण का बाजार उसे अपनी ओर खींचने में सफल हुआ है जैसे अमुक साबुन के नियमित प्रयोग से टॉप मॉडल बना जा सकता है और अमुक क्रीम के इस्तेमाल से खोया हुआ आत्मविश्वास वापस पाया जा सकता है।
वस्तुत: मीडिया निर्मित सुन्दरता ही वास्तविक सुन्दरता बनती जा रही है। दरअसल सुन्दरता की चाह रखना या उसे बनाए रखने के प्रयास करना बुरा नहीं है परंतु सुन्दरता का बाजारीकरण करना गलत है। इस घटना पर इस्मत चुगताई की कुछ पंक्ति याद आती हैं कि औरत बेवा हो जाती है तो उसकी चूडिय़ां तोड़ देते हैं पर पुरुष की घड़ी या ऐनक या हुक्का तोडऩे का कभी किसी को खयाल नहीं आया। उनकी इस बात से सहमत हुआ जा सकता है शायद औरतों का सजना-संवरना, सुंदर दिखना केवल उसके पति (पुरुष) के लिए होता है उसके खुद के लिए नहीं। अत: इस नजरिए को बदले बिना समाज में बदलाव लाना संभव नहीं है।