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बर्न आउट सिंड्रोम से ग्रसित हो रहा आज का कामकाजी युवा वर्ग

— डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा, स्वतंत्र लेखक व स्तंभकार

जयपुरApr 02, 2025 / 03:05 pm

विकास माथुर

बात थोड़ी अजीब अवश्य लगती है पर इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि आज की कामकाजी पीढ़ी बर्न आउट सिंड्रोम का सहज शिकार हो रही है। दरअसल आज की पीढ़ी कार्यस्थल और निजी जीवन में तालमेल पूरी तरह से बैठा नहीं पा रही है और यही कारण है कि बदलती जीवनशैली के कारण कामकाजी लोग तेजी से बर्न आउट से ग्रसित हो रहे हैं।
न्यूयार्क के बिजनेस प्रोसेस मैनेजमेंट प्लेयर वर्टेक्स की ओर से भारत में कराए गए सर्वे के आंकड़ें तो यहां तक बताते हैं कि आधे से अधिक लोग बर्न आउट से ग्रसित हैं। देखा जाए तो कोरोना के बाद हालात और अधिक तेजी से बदले हैं। कार्यस्थल और परिवार के बीच संतुलन नहीं बना पाने के कारण एक तरह की उदासीनता के शिकार हो रहे हैं। बर्न आउट से प्रभावित युवाओं में एक तरह की उदासीनता, नैराश्य आने लगता है, जिसके कारण मानसिकता प्रभावित होती है और उसका प्रभाव नकारात्मकता के रूप में सामने आता है। इतना अवश्य है कि बर्न आउट सिंड्रोम और डिप्रेशन में अंतर करके चलना होगा। बर्न आउट सिंड्रोम डिप्रेशन का कारण नहीं होता पर एक सीमा के बाद व्यक्ति की रचनात्मकता को प्रभावित अवश्य करता है।
पिछले दिनों इंफोसिस के नारायण मूर्ति ने 70 घंटे और एलएंडटी के एसएन सुब्रह्मण्यम ने 90 घंटे की काम की सलाह के साथ ही नीति आयोग के पूर्व मुख्य कार्यकारी अमिताभ कांत के 80 से 90 घंटे काम करने की सलाह पर काफी बहस हो चुकी है। अधिकांश ने इसे त्रासद और निराशाजनक सुझाव ही माना है। वैसे भी देखा जाए तो पांच दिन के सप्ताह वाले कार्यस्थलों पर सप्ताह में 44 से 45 घंटे और छह दिवसीय कार्यस्थलों पर करीब 48 घंटे कार्यस्थल पर होते हैं। नई कार्य संस्कृति और इंटरनेट की दुनिया में काम के घंटे कुछ भी हों, कार्मिक को मोबाइल पर हमेशा तैयार रहना पड़ता है। हालात यहां तक हैं कि वर्क फ्रॉम होम के दौर के बाद नियोक्ताओं की अपेक्षाएं काफी बढ़ गई हैं। फिर टारगेट ओरिएंटेड कामकाजी लोगों को तो घर हो या आफिस हमेशा टारगेट ही दिखाई देता रहता है।
हाइब्रिड सिस्टम और वर्चुअल चर्चाओं का दौर तो और भी त्रासद स्थिति में ला देता है। ऐसे में घर परिवार की जिम्मेदारियों और नौकरी के समय के बीच तालमेल बैठना लगभग मुश्किल भरा होता जा रहा है। सबसे त्रासद हालात तो यह हो जाते हैं कि नए हालातों में सप्ताह के अवकाश का भी कोई महत्त्व नहीं रह जाता है। या तो काम का बोझ इतना हो जाता है कि अवकाश के दिन भी इंटरनेट की दुनिया में खोये रहना पड़ता है या फिर हाइब्रिड व्यवस्था के चलते कभी कहीं भी वर्चुअली जुडऩा पड़ जाता है और अवकाश के रिलेक्स होने के क्षण भी बाधित हो जाते हैं। हालात तो यहां तक हो गए हैं कि अब तो सरकारी, गैर-सरकारी संस्थानों में समान रूप से अवकाश या समय-असमय जुडऩा पड़ता है। देखा जाए तो तकनीक की सुविधा बाधक भी बनती जा रही है। एक सीमा तक तो यह सही ठहराई जा सकती है पर वर्चुअली व्यवस्था जब बिना रात दिन देखे सामने आती है तो निश्चित रूप से कार्मिक के व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करती है।
बर्न आउट सिंड्रोम का पहली बार प्रयोग 1974 में हर्बर्ट जेफ्रायडेन बर्गट ने किया था। तब इसकी गंभीरता को समझा भी नहीं जा सका था। आज यह एक समस्या के रूप में उभरती जा रही है। बर्न आउट के प्रभाव से शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और व्यवहारगत असर देखा जा रहा है। शरीर में दर्द, नींद नहीं आने से लेकर थकान, कमजोरी, वजन कम होना तक इसके लक्षणों में शामिल है तो उदासी, चिंता, निराशा, क्रोध, अनिर्णय के हालात मनोवैज्ञानिक प्रभाव देखने को मिल रहा है। इन सब के कारण व्यक्ति के व्यवहार पर असर दिखाई देने लगता है और परिणामस्वरुप जो परिणाम चाहिए वह सही मायने में नहीं मिल पाते। चिड़चिड़ापन और साथियों के साथ व्यवहार में भी बर्न आउट के लक्षण साफ तरह से देखे जा सकते हैं।
बर्न आउट सिंड्रोम को लेकर मनोविज्ञानियों को समय रहते इसके निराकरण के उपाय खोजने ही होंगे। कार्यस्थल पर कितना समय बिताना है या कार्यस्थल का कैसा माहौल है यह दीगर बात होगी, सबसे महत्त्वपूर्ण यह होगा कि बर्न आउट सिंड्रोम से प्रभावित लोगों को अपने आप से ही सुधार के प्रयास करने होंगे। सप्ताहांत परिवार को देने, नियमित योग-व्यायाम, सोशल मीडिया और इंटरनेट की दुनिया से एक सीमा तक दूरी बनाने और घर परिवार व कार्यस्थल के बीच बेहतर तालमेल बनाने जैसे कदम उठाने होंगे। कार्यस्थल के कार्य को भी बोझ न मानकर पूरे मनोयोग से करने और कार्य समय के बाद घर पर पारिवारिक माहौल में जीना ही सही मायने मेें इसका समाधान हो सकता है। घर परिवार के साथ हो तब काम के बोझ के नीचे न दबें। वहीं कार्यस्थल पर मनोयोग से काम करने से समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। इसके लिए नियोक्ता को भी चाहिए कि यदि वे अपने कार्मिकों से बेहतर परिणाम पाना चाहते हैं तो कार्यस्थल पर सकारात्मकता बनाए रखनी ही होगी।

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