दरअसल, वर्ष 2006 में राज्य सरकार के निर्देश पर बनी हाई एम्पायर कमेटी ने झील के भराव क्षमता को आधा किया था। इस दौरान झील के भराव क्षेत्र के कई हिस्सों में मिट्टी डालकर पाट दिया गया। कभी दिल्ली रोड, कर्बला मैदान और परशुरामद्वारा तक फैली झील का दायरा सीमित हुआ तो अब पानी तो खूब नजर आता है, लेकिन भराव क्षेत्र सीमित हो गया।
निजी फायदे के लिए बिगाड़ा मूलस्वरूप इस झील का निर्माण वर्ष 1871 में किया गया था। झील में नाहरगढ़ की पहाडिय़ों, नाग तलाई नाला, ब्रह्मपुरी नाला और जयपुर शहर का पानी आता है। लोगों का मानना है कि जयसिंहपुरा खोर में खेती के दौरान झील के पानी का उपयोग किया जाता है। हालांकि, अब यह पानी काफी कम हो गया है।
आठ एमएलडी के एसटीपी से चलाया जा रहा काम झील में रहने वाले जीव-जंतुओं को साफ पानी मिले, इसके लिए 27 एमएलडी का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगना था, लेकिन ब्रह्मपुरी थाने के पीछे महज आठ एमएलडी का प्लांट लग पाया। ऐसे में रोज हजारों लीटर गंदा पानी सीधे झील में गिरता है। बरसात के दिनों में तो और बुरा हाल हो जाता है। स्थिति यह है कि हैरिटेज निगम के इस प्लांट से निकलने वाले पानी को और साफ करने के लिए जेडीए ने 7.8 एमएलडी का टर्चरी ट्रीटमेंट प्लांट लगा रखा है। ये प्लांट पुरानी तकनीक पर ही चल रहा है। इसको अपग्रेड करने की भी जरूरत महसूस की जा रही है।
पत्रिका व्यू मूल स्वरूप में लौटाओ झील वर्ष 2006 से पहले जिस आकार में झील थी, उसी स्वरूप में लाना हम सभी की जिम्मेदारी है। वैसे भी राजधानी जयपुर और आस-पास के क्षेत्र में तालाब, बांध और बावडिय़ां अनदेखी की भेंट चढ़ चुके हैं। जिस तरह से राजधानी में आबादी बढ़ रही है, उसको ध्यान में रखते हुए मानसागर झील को न सिर्फ बचाने और संवारने की जिम्मेदारी है, बल्कि इसका मूलस्वरूप में भी लाना जरूरी है। ताकि, जब बारिश हो तो झील में ज्यादा पानी आए। पानी अधिक आएगा तो वर्ष भर झील लबालब रहेगी। इससे न सिर्फ आस-पास के इलाकों का जलस्तर सुधरेगा, बल्कि खेती में भी पानी का उपयोग किया जा सकेगा।